बदल रहा बोतल का लेबल, बदल रही अंदर हाला, बदल रहा मंतव्य शब्द का, करवट लेती मधुबाला । "अच्छे दिन" की संरचना के ताने - बाने बुनते हम, दोमुंहे सापों से एक दिन मुक्त करेंगे मधुशाला।
पीनेवालों ने कब सोची मँहगी या सस्ती हाला, फटी जेब वालों को मिलता सब्सिडी वाला प्याला, वोटबैंक की राजनीति हो, साकी मस्कावाली हो, तो मरघट में भी रच जाती है मूर्खों की मधुशाला।।
साकी वे दिन कहाँ गए जब खाते थे कोयला काला ,
टू जी, थ्री जी, जीजाजी की हीं चर्चा थी धत साला।
अब तो बस श्री - संत महोत्सव हीं दिखलाई पड़ता है,
कितनी आसानी से मुद्दे मोड़ रही है मुधुशाला।।
अब प्रगल्भ होती दिखती है मधुशाला की मधुबाला, बचपन इसने काट दिया है प्याले में भरते हाला। सोंचा था जो कुछ पीना हो प्याले में रखकर पीऊँ, लेकिन अब तो सीधे - सीधे मुंह में आती मधुशाला।।
34. माना मधुघट में हीं सागर भर लाई है मधुबाला, माना प्याले में भर देगी वह फिर - फिर मादक हाला। आतुरता तासीर सुरा की, तब कैसे थक जाऊँगा ? मुत्यु - पार भी जाकर मुझको याद रहेगी मधुशाला।। ............ सरोज कुमार
नित-नित रूप बदलती साकी की सुन्दरता की हाला प्याले की क्या रही जरूरत आँखों से ही पी डाला. मदिरा जो पी ली जाती है बिन मधुघट बिन प्याले की उसकी मादकता के आगे शीश झुकाती मधुशाला.
बड़े - बड़े बड़बोलों के मुंह पर लटका है अब ताला जबसे जनता की नजरों में आया उनका घोटाला, इस हमाम में आकर सारे नंगे हीं क्यों हो जाते ? मौलिक शोध करेगी इसपर कब यह कायर मधुशाला ?
मांग रहे हैं पीनेवाले आज शहादत की हाला साकी का असमंजस यह कि उसमें भी है घोटाला, भगत सिंह जैसों की तो फांसी का फंदा थी दुल्हन लेकिन काले-धन को दुल्हन मान रही अब मधुशाला.
परत - दर - परत अब खुलता जाता री साकी सब घोटाला लेकिन वह बेशर्म चाल फिर चल देता कुत्तेवाला, मुद्दे नए- नए ले आता, बहस नयी छिड़ जाती है विस्मृति का अभिशाप युगों से ढोती है यह मधुशाला. ............... सरोज कुमार
किसका किसका चरण गहे यह पैरोडी कहनेवाला मौलिकता का रोग लगा बैठा है हर पीनेवाला, दुहराता इतिहास तो कविता नयी कहाँ से लाऊँ मैं, जन्मा, जीया, मरा पुनः बस यही कथा है मधुशाला. ............... सरोज कुमार
प्रधानमंत्री के द्वारा लालकिले से बिजली के सम्बन्ध में दिए गए आश्वासन के सन्दर्भ में- ******** हो कमजोर पकड़ प्याले पर उसको मत देना हाला, कठपुतली का खेल यहाँ अब और नहीं चलने वाला, भाषण में हीं बाँट रहा जो बिजली घर-घर रे साकी ! उसकी बातों में आएगी अब क्योंकर यह मधुशाला ?
बड़े-बड़े बड़बोलों के मुंह पर लटका है अब ताला किसी मर्द से शायद उनका साकी पड़ा है अब पाला. लोकपाल का ऊंट भले हीं बैठे चाहे जिस करवट नीयत सबकी समझ रही है साफ-साफ यह मधुशाला.
भ्रष्ट विचारों वाली दुनियां में 'अन्ना' एक मतवाला उनके अनसन में शामिल होने को जाती मधुबाला मैं भी उसके हीं पीछे जाता हूँ यारों! माफ़ करो परदे के पीछे से मुझ को अब ढूंढेगी मधुशाला.