पीनेवालों ने कब सोची मँहगी या सस्ती हाला, फटी जेब वालों को मिलता सब्सिडी वाला प्याला, वोटबैंक की राजनीति हो, साकी मस्कावाली हो, तो मरघट में भी रच जाती है मूर्खों की मधुशाला।।
साकी वे दिन कहाँ गए जब खाते थे कोयला काला ,
टू जी, थ्री जी, जीजाजी की हीं चर्चा थी धत साला।
अब तो बस श्री - संत महोत्सव हीं दिखलाई पड़ता है,
कितनी आसानी से मुद्दे मोड़ रही है मुधुशाला।।
अब प्रगल्भ होती दिखती है मधुशाला की मधुबाला, बचपन इसने काट दिया है प्याले में भरते हाला। सोंचा था जो कुछ पीना हो प्याले में रखकर पीऊँ, लेकिन अब तो सीधे - सीधे मुंह में आती मधुशाला।।